केरलियों के राष्ट्रीय त्योहार ओणम के इतिहास संबंधी मतमतांतर हमारे बीच में प्रचलित हैं। कई प्रमाणों के आधार पर हजारों साल पूर्व ही यह ओणम आनंद, खेल एवं व्यापार से संबद्ध होकर यहाँ मौजूद था। उपलब्ध कई इतिहासग्रन्थों, लेखों, टिप्पणियों, चित्रों, चिट्ठियों आदि में ओणम के वैविध्य का उल्लेख प्राप्त होता है। केरल की सामाजिक प्रकृति वैविध्यपूर्ण रही थी। यहाँ की नदियाँ, पहाड़, संस्कृति, भाषा, आर्थिक भिन्नता , जाति, धर्म आदि का वैविध्य यहाँ के कई कहानियों एवं गीतों में उपलब्ध होता है। यहाँ की विशेष जलवायु का सामना करनेवाले मनुष्य समूहों की विभिन्न अवस्थाओं का वर्णन कई गीतों में अंकित है। तीन-चार महीनों तक की बारिश का लंबा समय उसके बाद आनेवाली हल्की सी धूप और इसके साथ पौधों का फूलना और फलना तथा फसलें का काटना आदि ओणम के समय की विषेशताएँ हैं। इस समय की धूप को ओणम की धूप, पौंधों के फूल को ओणम के फूल और फसलों को ओणम की फसलें आदि नामों से पुकारा जाता है।
सदियों पहले ही ओणम और प्रकृति के बीच के संबंध उल्लिखित है। तब लंबे समय की बारिश के बाद स्त्रियाँ और बच्चे विविध प्रकार से पुष्पों को अलंकृत कर खेलते थे। उस समय के ओणम के गीतों में खेल और आनंद का माहौल प्रकट है। लेकिन स्त्रियों और बच्चों के ऐसे खेलों को बाद में नियमों एवं रूढ़ियों से बद्ध कर दिया गया। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो केरल में मंदिर और मंदिर केंद्रित आराधना के आरंभ के पूर्व ही प्रकृति और जलवायु से संबद्ध यह त्योहार मनाया जाता था। इस त्योहार में सबसे मुख्य है ‘पूक्कलम’ ( फुल को विभिन्न आकार में सजाना) बनाना। स्त्रियाँ और बच्चे मिलकर यह करते थे। ओणम संबंधी सभी गीतों में पूक्कलम व्यापक रूप से वर्णित है। पूक्कलम के समान केरल भर में प्रचलित थीं तृक्काक्करा अप्पन, ओणत्तप्पन, मातेवर , मावेली आदि संकल्पनाएँ। ये कच्ची मिट्टी को गूँथकर लिंगाकार में चार कोणोंवाले और नुकीले अग्र के रूपाकार में बनाए जाते हैं। इसके विभिन्न रूपों और प्रतीकात्मकता पर भी विद्वानों के बीच में मतभेद है।
19वीं शती के मध्य से लेकर व्यापक रूप से प्राप्त मावेली का इतिहास संबंधी ओणम – गीतों के पाठों में मावेली नामक राजा से ओणम को संबद्ध कर दिया गया है। 18वीं शती से शुरू हुआ इन गीतों का निर्माण। यह कंठस्थ करके रखने के साथ ताड़पत्रों में और बाद में पुस्तक रूपों में भी प्राप्त हुआ। अब ऑनलाइन में भी इन गीतों के कई पाठ प्राप्त होते हैं। कहा जाता है कि तृक्काक्करा में जब मावेली राजा शासन कर रहे थे तब जनता उनके पास जाकर ओणम मनाती थी। बाद में वृद्ध और बच्चों को उनके पास तक जाने की कठिनाई को समझकर मावेली के निर्देशानुसार ओणम घर पर ही मनाना शुरू हुआ। यह गीतों में कहा गया है। लेकिन जब मावेली धरती को छोड़कर चला गया तब से लेकर ओणम समाप्त हो गया। इसमें दुखी जनता की प्रार्थना सुनकर माधवन अथवा महेश्वर ने मावेली के साथ चिंगम (श्रावण) के तिरुवोणम नक्षत्र (मलयालम नक्षत्र) में अपने देश में आकर कुछ दिनों तक व्यतीत किया । पुनः व्यापक रूप से शुरू हुए उत्सव में भाग लेकर वे वापस गए। इस गीत की ज्यादातर पंक्तियों में ओणम के व्यापार और ओणम की तैयारियों का वर्णन खूब है।
थोड़े-थोड़े परिवर्तन के साथ उपर्युक्त गीत के आठ पाठ भेद प्राप्त हैं। उनमें से एक है एक बच्चा मावेली से आकर तीन पाद मिट्टी माँगता है और इसलिए मावेली को मिट्टी को छोड़ना पड़ा। अन्य पाठों में मावेली का मिट्टी को छोड़ने का कारण नहीं बताया जाता है। इस गीत के सभी पाठों में ‘ मावेली जब देश का शासन करता था’ से शुरू होनेवाली पंक्तियाँ प्राप्त हैं। केरल में कई प्रकार से ओणम को मनाते थे। लेकिन यह देखा जाता है कि कई कार्यो में समानताएँ थीं। इसके उदाहरण कई पंक्तियों में प्राप्त हैं जैसे – “ मानव सब एक समान थे”, “ ओणम सब एक समान थे”, “ संसार सब एक समान थे ” आदि को बार-बार दुहराने से गीतकार इन समानताओं की ओर इशारा करते हैं।
इसके अतिरिक्त कुट्टनाटु के वेला जाति ( दलित ) के ‘मलमा की कथा’ में “नल्लच्चन मावेली”, पाक्कनार गीतों में “ मावेलियाँ कुयिलिनाशारी” , वल्लुवनाटु के गीत में “ मावोती” जैसे समान पात्र केरल के फोकलोर में प्राप्त हैं। अर्थात सभी मावेली लोग एक बुजुर्ग या अच्छा पिता या राजा के रूप में चित्रित है। वैसे ही मलयर लोगों के “ओणप्पोट्टन” ( ओणम का मूर्ख) जैसा “ओणेश्वर” और “ओणत्तार तेय्यम” को भी इसमें सन्निविष्ट किया जा सकता है। ओणप्पाटु सुरियानी ईसाईयों और उसका भी दूसरा रूप “ओणत्तल्ल” में मलबार माप्पिला मुस्लीम दलित समाज भी भाग लेते दिखाई देता है। इस खेलयुद्ध का लघु रुप होगी ओणम का समय की वटमवली (रस्साकशी) प्रतियोगिता।
ओणम के समय व्यापार को लक्ष्य करके उसमें सक्रिय होनेवाले माप्पिला मुस्लिम समाज, सुरियानी ईसाई लोग, तमिल ब्राह्मण, चेट्टियार आदि लोग पुराने समय से दिखाई देते हैं। किसी न किसी प्रकार दक्षिण मलबार से लेकर मध्य तिरुवितांकूर तक के लोग पुराने समय में ओणम मनाते थे। वहाँ आदिवासी लोग ओणम से दूर थे। इसका मतलब है कि आधुनिक काल के समान पुराने जमाने में भी ओणम कई प्रकार के सामाजिक आर्थिक विनिमयों का उत्सव रहा था। इसका प्रतिपादन कई गीतों में प्राप्त है। शहर के बाजारों में जितना विनिमय चलता है उतना नहीं है तो भी अन्य अनेक प्रकार का व्यापार विनिमय गाँवों में भी चलता था।
हाल ही में ओणम को ऋग्वेद और ज्योतिष की बुनियाद तैयार कर महाबली के बदले में वामन को नायक रूप में प्रतिष्ठित कर महाबली संबंधी निम्न जातियों एवं अन्य वर्गों के ओणम संबंधी मिथक को दरकिनार कर दिखाई देता है।
संक्षेपतः यद्यपि ओणम के संबंध में अनेक कथाएँ, पाठ एवं गीत केरल समाज के विभिन्न जातियों , धर्मों एवं वर्गों में प्रचलित थे तो भी यह खेल एवं आनंद का उत्सव है। आधुनिकता के परिप्रेक्ष्य में प्राचीनता को प्रकाशित कर परंपरा को निर्मित करने की कोशिश हो रही है। फिर भी ओणम के समय सभी प्रकार के अधिकारों से मुक्त होकर स्वातंत्र्य का आनंद खेलों के द्वारा प्रकट किया जाता है। बच्चों, स्त्रियों एवं बुजुर्गों के खेल में इसी स्वातंत्र्य का आनंद केरल की संपूर्ण जनता जाति – धर्म भेद के बगैर अनुभव करना चाहती है।
के. वनजा
कोच्चि

