माहात्मा अय्यनकालिका १६२ वाँ जन्मदिन २८ अगस्त को हम मना रहे हैं। इस संदर्भ में हमें क्या-क्या याद करना और निर्णय लेना है। केरल के दलितों के उत्थान में सबसे ज्यादा सराहनीय काम उन्होंने किया था।हमारे इतिहास में दलित जननायकों का नाम अभी तक काफी मात्रा में दर्ज नहीं किया गया है। कुछ नामोल्लेख मात्र इधर-उधर प्राप्त है, जैसे– पोयकयिल अप्पच्चन,अय्या वैकुंठ स्वामी, कंडन कुमारन, कुरुंबन देवदत्तन,पांपाड़ी जोणजोसफ आदि। उनमें सबसे उल्लेखनीय नाम हैमाहात्मा अय्यनकालि का। आधुनिक केरल को बनाने में उनका योगदान निश्चय ही इतिहास में अंकित हुआ है, अंकित करना पड़ेगा।क्योंकिकेरल का सशक्त सामाजिक योद्धा रहे थे वे। हमारे पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने उन्हें ‘भारत का महान पुत्र’ कहा। १९३७ में गाँधीजी उनसे मिलने के लिए उनके जन्म स्थान वेंगानूर पहुँचे थे। ऐसे महान व्यक्तित्व का स्मरण करना मेरा लक्ष्य है।
१८६३ में अय्यन और माला के बेटा कालि का जन्म तिरुवनंतपुरम के पास वेंगानूर में एक पुलया (दलित) जाति में हुआ। उस समय जाति के नाम पर जो भेदभाव एवं छुआछूत चल रहे थे वे अकथनीय थे। इसलिए विवेकानंद ने जब केरल में पर्यटन किया तो केरल को पागलखाना कहा था। सर्वण अपने सारे अधिकारों के साथ अवर्ण के ऊपर अपना प्रभुत्व जमा रहा था। अवर्ण को विद्याध्ययन निषिद्ध था,रास्ते से होकर चलने का अधिकार नहीं था, कृषिस्थल नहीं था, इस प्रकार कई प्रकार से तुल्य नीति औरअधिकारों से अवर्ण वंचित थे। राजा लोग ब्राह्मण सेवा में निरत थे। पुलया (दलित) और परया (दलित) को क्या करना था इसका निर्णय लेनेवाले ब्राह्मण थे। सारा धन ब्राह्मणों के लिए क्षत्रिय खर्च करते थे। समाज की संरचना जडवत रही थी। उसी समय ब्रिटिशों का आगमन हुआ। ब्रिटिश उपनिवेश में केरलीय जनता गतिमय होने लगी। इसके साथ ईसाई मिशनरियों ने जनता की आत्मा की रक्षा करने काबड़ा काम किया। उस संदर्भ में राजाओं का वेष प्रतीकात्मक रूप में पहनकर अय्यनकालि तमिलनाटु से “विल्लुवंडी” (एक प्रकार की गाड़ी जो दो बैलों द्वारा खींची जाती है) में घंटी बजाते हुए राजमार्ग से होकर अतिसाहस के साथ आए। उस समय राजमार्ग से होकर चलने का अधिकार पुलया जाति के लोगों के लिए नहीं था।दूसरीबात यह है कि पुरुष लोगों का वेष घुटनों तक की धोती मात्र था। “विल्लुवंडी” को रोककर सवर्णों ने उनको मार डालने की कोशिश की। लेकिन वीरता के साथ उन्होंने उनका सामना किया और अपनी जाति के लोगों को एकत्र कर राजमार्ग से चलने का अधिकार हासिल किया। केरल में उस समय रोड की आवश्यकता को राजा लोगों ने पहचानातक नहीं था। इस समर ने “विल्लुवंडी समर” के नाम से प्रसिद्धि प्राप्त की।
अय्यनकालि का दूसरा प्रसिद्ध समर दलितों को शिक्षा प्राप्त करने के अधिकार के लिए था। शिक्षा के निषेध होने पर खेतों में “मुट्टिप्पुल्लु” (एक प्रकार का घास)उगा देने की धमकी उन्होंने की । इसका मतलब है कि सवर्णोंके खेत में कृषि करने के लिए वे तैयार नहीं होंगे। उन्होंने दलितों के लिए प्राथमिक स्कूल खोला। सवर्णों ने स्कूल जलाया। बार-बार खोलना और जलाने का कार्य हुआ। लेकिन उन्होंने उद्यम छोडा नहीं। मछुआरों को भी मिलाकर उन्होंने कामयाबी हासिल की। यह समर१९०४ में हुआ। लेकिन लड़कियों को पढ़ने का अधिकार इस समर से भी नहीं मिला। १९१४ में “ऊरुट्टम्बलम समर” लड़कियों के स्कूल प्रवेश के लिए उनके नेतृत्व में चलाया गया।
अय्यनकालि ने “साधुजन परिपालन संघ” स्थापित किया। इसका लक्ष्य समस्त दलित- शोषितों की रक्षा थी। इस संघ की स्थापना के पीछे बौद्ध धर्म की विचारधारा रही थी। यह ‘संघ’ शब्दभी बौद्ध धर्म का रहा था। इस संघके नेता होने के नाते अय्यनकालि को १९११ में श्रीमूलम प्रजा सभा में उनकी नियुक्ति हुई। इस प्रकार निम्न जाति से विधि निर्माण सभा में मनोनीत पहला व्यक्ति बन गए अय्यनकालि। उस सभा में रहते हुए अय्यनकालि ने जो प्रयत्न कियाउसके फलस्वरुप १९१४ में निम्न जाति के सभी लड़कोंऔर लड़कियों को पढ़ने का स्वातंत्र्य श्रीमूलं राजा ने दिया। १९०७ में केरल का प्रथम कृषक मजदूरों का समरछिड़ गया। खेतों में काम करनेवाले मजदूरों को कृषिस्थल देना और उनके अधिकारों के संरक्षण के लिए था यह समर। खेत में गुलाम सदृश्य काम करनेवाले मजदूरों को न्याय दिलाने में एक हद तक यह सहायक हुआ।
१९१४ में संपंन्न हुए “कल्लुमाला” ( पत्थर की माला) का आंदोलन भी विशेषतः विचारणीय है। उस समय की पुलया स्त्रियों को पत्थर की माला पहननी पड़ती थी। छाती छिपाना मना था।घुटनों तक की धोती पहनती थी।ये सब निर्धारित करते थे सवर्ण लोग। अर्थात अपने पसंद के वस्त्र पहनने का भी अधिकार नहीं था दलित स्त्रियों को। गोपालदास नामक आदमी के नेतृत्व में बड़ा आंदोलन चलाया गया। महात्मा अय्यनकालि ने भी साथ दिया था। एक सम्मेलन में स्त्रियाँ एकत्र हुईं और उन्होंने अपनी मालाओं को तोड़ डाला। इसके जरिए उनको छातीछिपाने का भी स्वातंत्र्यप्राप्त हुआ।
उपर्युक्त सारे समर के पीछे महात्मा के दलितोद्धार का लक्ष्य रहा था।दलितों को समाज में शिक्षित कर अपने अधिकारों के प्रति सजग बनाकर मनुष्य के रूप में जीने को प्रेरित किया है अय्यनकालि ने। अपना पूरा जीवन दलितोंकोन्यायपूर्ण अधिकार देकर उनकी अस्मिता को बनाने के लिए समर्पित था। इसलिए केरलीय नवोत्थान के इतिहास में उनका नाम सुनहले अक्षरों में अंकित होना चाहिए। उनके जन्मदिन के इस शुभ अवसर पर मनुष्य – मनुष्य के बीच के भेद को समाप्त करने केलिए अपना पूरा जीवन समर्पित उस महात्मा को शत शत प्रणाम।
के. वनजा
कोच्चि

